पारस मणि स्वामी विवेकानन्द

 पारस मणि स्वामी विवेकानन्द


स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व पर पारस मणि की उपमा सटीक बैठती हैं | जैसे पारस मणि द्वारा लोहे को बहुमूल्य सोने में बदलने की क्षमता के बारे में हम सुनते हैं, उसी प्रकार मात्र 39 वर्ष की अल्पायु में अपनी पारी पूरी करने वाले इस युवा संन्यासी के चुम्बकीय व्यक्तित्व से सामान्य भक्तों से लेकर ख्यातनाम लोगों ने अपने जीवन को स्वर्णिम बनाया है | ऐसे ही कुछ नामों की चर्चा करते हैं, जिनके व्यक्तित्व पर स्वामी जी के प्रत्यक्ष सान्निध्य की छाप साफ़ दिखाई देती है |

भारत से बाहर के ख्यातनामों की बात करें तो इनमें एक नाम है -  निकोला टेसला | फ़्रांस की एक स्टेज कलाकार सारा बर्ननाट के एक शो में स्वामी विवेकानंद और प्रसिद्द वैज्ञानिक निकोला टेसला की प्रथम मुलाकात हुई और उसे बाद दोनों के मध्य काफी गहरा संवाद हुआ | बल, पदार्थ और ऊर्जा के आपसी सम्बन्ध को लेकर स्वामी द्वारा प्रतिपादित वेदान्त ज्ञान से टेसला बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने इसके गणितीय सूत्र पर काम करना प्रारंभ किया | स्वामी विवेकानंद के एक पत्र में वर्णित है – “मिस्टर टेस्ला सोचते हैं कि वे गणितीय सूत्रों के जरिए बल और पदार्थ का ऊर्जा में रूपांतरण साबित कर सकते हैं. मैं अगले हफ्ते उनसे मिलकर उनका यह नया गणितीय प्रयोग देखना चाहता हूं. टेस्ला का यह प्रयोग वेदांत की वैज्ञानिक जड़ों को साबित कर देगा जिनके मुताबिक यह पूरा विश्व एक अनंत ऊर्जा का रूपांतरण है. (विवेकानंद रचनावली, वॉल्यूम – V) | इस सारे प्रसंग को अंतर्राष्ट्रीय टेस्ला सोसायटी के अध्यक्ष रहे टॉबी ग्रोट्ज ने अपने लेख  Nikola Tesla and Swami Vivekananda  में स्पष्ट किया है | इस आलेख में जहाँ एक और वेदान्त के शब्द आकाश और प्राण को उल्लेखित किया है, वहीँ इस लेख से यह भी पता चलता है कि स्वामी जी से प्रेरित निकोला टेसला ने अपने दुसरे वैज्ञानिक मित्र  केल्विन को भारतीय अध्यात्म से सम्बन्धित पुस्तकें भेंट की | आगे चलकर आइंस्टीन ने जो फार्मूला दिया ,  उसकी नींव टेसला ने रख दी थी |

1895 में लन्दन प्रवास के दौरान स्वामी विवेकानंद जी ने अपने एक भाषण में कहा कि “मुझे सभी से आशा नहीं है, मुझे कुछ चुने हुए 20 लोग चाहिए, जो अपना सम्पूर्ण जीवन संसार सेवा में न्योछावर कर सकें” |  अगले ही दिन सुबह ही एक युवती स्वामी जी से मिलकर कहती है कि कल आपने 20 लोगों की बात की थी | 19 का तो मुझे नहीं पता पर एक आपके सामने है |" और वह थी आयरलैंड में जन्मी मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल, जो स्वामी जी के उदात्त दृष्टिकोण, वीरोचित व्यवहार और स्नेहाकर्षण से इतनी प्रभावित हुई कि भारत को ही जिसने अपनी कर्मभूमि मान लिया और भगिनी निवेदिता के रूप में भारतीय पुनर्जागरण की वाहक बनी |

पश्चिम जगत की सुविख्यात फ्रेंच गायिका एम्मा कल्वे की इकलौती बेटी के शिकागो में एक अग्नि हादसे में मृत्यु के बाद वह गहरे अवसाद का शिकार हो गयी थी, जिसके चलते चार बार वह आत्महत्या की भी कौशिश कर चुकी थी | स्वामी विवेकानंद जी से मिलने के बाद उसको जीवन की दिशा मिली, पुन: गाना शुरू किया  और अंतिम श्वास तक अध्यात्म की शरण में रही |

आधुनिक इतिहास के सबसे धनी व्यक्ति और विश्व के प्रथम अरबपति के रूप में विख्यात अमेरिकी व्यापारी जॉन डेविसन रॉकफेलर जब 1893 में शिकागो में पहली बार अहंकार के साथ स्वामी जी से मिलने आए, तो स्वामी जी ने उन्हें अपने धन पर घमंड करने की बजाए इस धन को मानवता की सेवा के अवसर के रूप में देखने का आग्रह किया | इस अनपेक्षित सलाह से नाराज होकर रॉकफेलर वापिस चला गया | एक हफ्ते बाद पुन: वापिस आया , पर इस बार हाथ में एक समाचारपत्र था, जिसमें एक सामाजिक काम के लिए रॉकफेलर के पहले बड़े दान के संकल्प का समाचार छपा था | ऐसी प्रेरणा थी स्वामी जी की कि आगे चलकर उन्होंने अपनी आय का न्यूनतम दशांश भाग समाज हित में लगाना शुरू किया और जिन्होंने मृत्यु से पूर्व अपनी डायरी में लिखा कि “देने का सुख ही जीवन जीने का सुख है” |

सितम्बर 1893 में स्वामी जी के सम्मान में एक शाकाहारी भोज का आयोजन प्रसिद्ध विद्युत आविष्कारक एलिसा ग्रे ने किया,  जिसमें प्रसिद्द वैज्ञानिक विलियम थोमसन भी शामिल थे, जो आगे चलकर लार्ड केल्विन नाम से प्रसिद्ध हुए |

 

आइये , अब भारत की कुछ ऐसी महान हस्तियों की बात करते हैं , जिनके जीवन  पर स्वामी जी की गहरी छाप है |  

शिकागो जाते हुए याकाहोमा-वैंकूवर की 12 दिन की जहाजयात्रा में स्वामी विवेकानन्द की एक पारसी व्यापारी से भेंट हुई - जमशेदजी नुसरवानजी टाटा | संक्षिप्त परिचय के बाद टाटा ने भारत में जापान से स्टील के आयात और फिर ट्रेडिंग की योजना की बात की | तब स्वामी जी सुझाया कि वे जापान से केवल तकनीक सीखकर आयें और भारत में स्टील का उत्पादन करेंगे, तो यहाँ के लोगों को रोजगार मिलेगा और भारत आत्मनिर्भर भी होगा |  जापन और ब्रिटेन द्वारा टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर से मना करने पर अमेरिका जाकर वहां के उद्योगपतियों से उन्होंने टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर का अनुबंध किया  और यहीं से  जमशेदपुर की टाटा स्टील की पहली फैक्ट्री की नींव पड़ी | इसी घटनाकर्म का जिक्र आज भी टाटा स्टील्स की वेबसाइट पर उपलब्ध है | इस पूरी मुलाकात की जानकारी स्वामीजी ने अपने भाई महेन्द्र नाथ दत्त को पत्र लिखकर दी थी । इस यात्रा के 5 साल बाद जमशेदजी ने 23 नवंबर 1898 को एक पत्र स्वामी विवेकानंद को लिखा था, ‘मुझे विश्वास है कि आपने जापान से शिकागो के रास्ते में जहाज के सहयात्री के तौर पर मुझे याद रखा होगा. भारत में वैज्ञानिक शोध केंद्र स्थापित करने के संबंध में मेरी योजना के बारे में आपने जरूर सुना या पढ़ा होगा. इस संबंध में आपके विचार मैं याद करता हूं.’ | स्वामी जी के अग्निबाणों का असर था कि टाटा स्टील की रूप में भारत की औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हुआ | साथ ही भगिनी निवेदिता के महती प्रयासों के चलते बंगलुरु में  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की स्थापना हुई थी |


प्रसिद्द वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु ने रेडियो तरंगों पर एक अनुसन्धान किया परन्तु उनके रिसर्च पेपर को विदेश में गायब कर दिया गया और कुछ समय बाद मार्कोनी ने उसी प्रकार के अनुसन्धान को पेटेंट करवा लिया | इस घटना से जगदीश चन्द्र बसु काफी अवसादग्रस्त हो गए | भगिनी निवेदिता, जो कि स्वयं भौतिकी की छात्रा रह चुकी थी और जगदीश चन्द्र बसु की पत्नी अबला बसु की अच्छी मित्र थी, ने जगदीश चन्द्र बसु की मुलाकात स्वामी विवेकानंद जी से करवाई | स्वामी जी ने उनको “वनस्पति में भी प्राण है” , भारतीय वेदान्त के इस सूत्र को प्रमाणित करने का आह्वान किया जिसपर जगदीश चन्द्र बसु ने पूरी तन्मयता से काम किया और विश्व के सामने सप्रमाण इस सत्य को सिद्ध किया | आगे चलकर बसु अमेरिकी पेटेंट प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय बने |

 गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जब फ़्रांस की यात्रा पर गए तो उनसे विश्व विख्यात साहित्यकार रोमारोला (Romain Rolland) ने भारत को जानने का मार्ग पूछा | गुरुदेव ने कहा कि यदि भारत को जानना है, तो रामकृष्ण परमहंस को समझना होगा और स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समझना है तो स्वामी विवेकानंद को जानना होगा | गुरुदेव के इस उत्तर के कारण रोमारोला ने बिना भारत आए तीन पुस्तकें लिखी – रामकृष्ण परमहंस पर, विवेकानंद पर और गांधी जी पर | रोमारोला के वचन है कि “Blessed are those who live in country where Ramakrishna lived. Double blessed are those who saw Ramakrishna and triple blessed are those who are working on the path shown by Ramakrishna”. विवेकानंद जी के बारे में रोमारोला कहते हैं  -“उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी।"

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिपुरुष लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के जीवन पर भी स्वामी जी का प्रभाव था | परिव्राजक के रूप में जब स्वामी जी अलग अलग नाम से पूरे भारत का भ्रमण कर रहे थे, उसी अवधि में एक बार उनका पूना जाना हुआ और इस दौरान वे तिलक जी के यहाँ ठहरे और उन दिनों वेद-वेदान्त और गीता जैसे विषयों पर इन दोनों विद्वानों की चर्चा हुआ करती थी | महाराष्ट्र की नारियों में पर्दा-प्रथा का अभाव देख, स्वामीजी ने यह आशा प्रकट की थी कि बौद्ध-युग की ही भांति यहां के उच्चवर्ग की कुछ महिलाएं यदि धर्म और आध्यात्मिकता के प्रचारार्थ अपना जीवन समर्पित कर दें, तो यह अति उत्तम होगा।  पूना के डेकन-क्लब में होने वाले एक साप्ताहिक विचार गोष्ठी में तिलक जी स्वामी जी को साथ ले गए | अंग्रेजी में होने वाली उस गोष्ठी में उस दिन काशीराम गोविन्द नातू ने किसी दार्शनिक विषय पर एक सुन्दर-सा व्याख्यान दिया। अब प्रचलित प्रथा के अनुसार किसी अन्य सदस्य को उसी विषय पर अपने विचार प्रकट करने थे, परन्तु व्याख्यान का विषय थोड़ा गूढ़ होने के कारण कोई भी खड़ा न हुआ। तब स्वामीजी खड़े हुए और उन्होंने उसी विषय के दूसरे पक्ष पर एक प्रांजल व्याख्यान दिया । विषय की इतनी सुन्दर व्याख्या सुनकर उपस्थित सभी लोग मंत्रमुग्ध रह गये । ऐसा कहते हैं कि तिलक और स्वामी जी दोनों की मुलाकात में ऐसी चर्चा हुई कि तिलक "राजनीतिक" क्षेत्र में राष्ट्रवाद की दिशा में काम करेंगे, जबकि विवेकानंद "धार्मिक" क्षेत्र में राष्ट्रवाद के लिए काम करेंगे । अपने समाचारपत्र केसरी में स्वामी जी के निधन के मौके पर श्रद्धांजली देते तिलक जी ने लिखा –

"कोई भी हिंदू, जिसके दिल में हिंदू धर्म के हित हैं, विवेकानंद की समाधि पर शोक महसूस करने में मदद नहीं कर सकता है। संक्षेप में, विवेकानंद ने दुनिया के सभी देशों के बीच अद्वैत दर्शन के बैनर को हमेशा के लिए उड़ने का काम लिया था और बनाया था उन्हें हिंदू धर्म और हिंदू लोगों की वास्तविक महानता का एहसास होता है। उन्होंने आशा की थी कि वह अपनी शिक्षा, वाक्पटुता, उत्साह और ईमानदारी के आधार पर इस कार्य की पूर्ति के साथ अपनी उपलब्धि का ताज हासिल करेंगे, जैसे उन्होंने एक सुरक्षित नींव रखी थी यह; लेकिन स्वामी की समाधि के साथ, ये आशाएं चली गईं। हजारों साल पहले, एक और संत, शंकराचार्य, जिन्होंने दुनिया को हिंदू धर्म की महिमा और महानता दिखाई। 19 वीं शताब्दी के दूसरे शंकराचार्य विवेकानंद हैं, जिन्होंने , दुनिया को हिंदू धर्म की महिमा दिखाई। उनका काम अभी पूरा होना बाकी है। हमने अपना गौरव, अपनी स्वतंत्रता, सब कुछ खो दिया है।" 


लाहौर के एफ.सी. कॉलेज में गणित के प्राध्यापक रूप में कार्यरत प्रोफेसर तीर्थराम गोस्वामी स्वामी जी से मिले और स्वामी विवेकानंद के वेदान्त पर ओजस्वी विचारों को सुनकर अत्यधिक प्रभावित हुए | श्रद्धावश तीर्थराम ने सोने की एक घड़ी जब विवेकानंद जी को भेंट की, तब स्वामी जी ने वह घडी तीर्थराम की ही जेब में रख दी और कहा कि मैं इसी जेब से इस घड़ी का उपयोग करता रहूँगा | स्वामी जी के तेजोमयी व्यक्तित्व के प्रभाव में तीर्थराम आगे चलकर स्वामी रामतीर्थ बन गए |

अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी जी लिखते हैं कि1901 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन के समय मुझे स्वामी जी के दर्शनों की इतना तीव्र उत्कंठा थी कि मैं पैदल ही बैलूर मठ तक चला गया पर दुर्भाग्यवश स्वामी जी के अस्वस्थ होने के कारण भेंट नहीं हो सकी | 1921 में बेलूर मठ में स्वामी जी की जयंती के अवसर पर बोलते हुए गाँधी जी ने कहा कि  स्वामी विवेकानंद को पढ़कर मेरे भीतर देशभक्ति हजार गुना बढ़ गयी है  | एक और जगह बोलते हुए उन्होंने कहा कि स्वामी जी द्वारा जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव की घोर आलोचना को वे बिलकुल सही मानते हैं क्योंकि अपनी ही मानव जाति में किसी को नीचा मानना एक प्रकार से अपने को ही नीचा करना है |

“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” का प्रभावी मन्त्र देने वाले नेता जी सुभाष चन्द्र बोस तो बाल्यकाल से ही विवेकानंद जी के अनन्य भक्त थे | वे उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे | दुविधा के क्षणों में स्वामीजी का वांग्मय उन्हें  राह दिखाता रहा है | इसी लिए जापान और सिंगापुर में आजाद हिन्द फ़ौज के गठन आदि के व्यस्त दिनों में भी उनके पास जो चीजें रहती ही थी -  उसमें गीता के साथ विवेकानंद की पुस्तक भी थी | ऐसे ही एक प्रसंग पर नेता जी ने अपने एक साथी को एक दिन नेताजी ने सिंगापुर स्थित रामकृष्ण मिशन के आश्रम से एक जपमाला खरीद कर लाने को कहा | स्वामी जी के ओजस्वी शब्दों के बारे में सुभाष बाबू कहते थे कि “उनके शब्द लेटे हुए को बिठा देने  की , बैठे हुए को खड़ा कर देने की, और खड़े हुए को गति में ला देने की क्षमता रखते हैं  |” एक और स्थान पर वे कहते हैं - “स्वामी जी ने पूर्व और पश्चिम को, धर्म और विज्ञान को, अतीत और वर्तमान को समन्वित किया और इसलिए वे महान हैं | हमारे देशवासियों ने उनकी शिक्षाओं से अभूतपूर्व आत्मसम्मान, आत्मविश्वास एवं आत्माभिव्यक्ति को प्राप्त किया है |”

पंडित जवाहर लाल नेहरु ने अपनी किताब 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में स्वामी जी के बारे में  लिखा, ‘उन्होंने वेदांत के अद्वैतवाद की व्याख्या की, जो न सिर्फ आध्यात्मिक था बल्कि तर्कसंगत भी और जिसकी संगति प्रकृति के वैज्ञानिक अनुसंधान से मिलती-जुलती थी.'

देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले क्रांतिकारियों के लिए भी स्वामी विवेकानंद प्रेरणापुंज थे | युगांतर और अनुशीलन समिति जैसे क्रन्तिकारी संगठनों के सूत्रधार रहे स्वामी विवेकानंद के भाई भूपेन्द्र नाथ दत्त ने स्वयं विवेकानंद पर एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक है  “स्वामी विवेकानंद पैट्रियट-प्रोफ़ेट” |  ढाका मुक्ति संघ नाम के क्रन्तिकारी सन्गठन के संस्थापक और कई क्रांतिकारियों को क्रांति मार्ग पर लाने वाले प्रमुख क्रन्तिकारी हेमचन्द्र घोष 1901 में ढाका में स्वामी विवेकानंद जी से मिले तो स्वामी जी ने उन्हें कहा कि भारत की राजनैतिक आजादी प्रथम आवश्यकता है और दुनिया की कोई ताकत इस सत्य को रोक नहीं सकती | भारत माता की आजादी के लिए चरित्रवान बनो और ताकतवर व निर्भय रहो “ |

तो इस प्रकार हम देखते हैं कि अलग अलग क्षेत्रों की विदेशी और स्वदेशी कितनी बड़ी बड़ी हस्तियों के जीवन पर स्वामी जी के जीवन की, उनके भाषणों की , उनके साहित्य की छाप है | दुनिया के सबसे युवा देश के युवाओं को प्रेरणा देने के लिए राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में उनके जन्मदिवस का चयन वास्तव में अति प्रासंगिक व सटीक है |

Comments

  1. बहुत ही ज्ञानवर्धक

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  2. बहुत ही प्रेरणादायक ।

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  3. अद्भुत क्षमता एवं विश्वास देने वाला लेख

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  4. सुंदर विवेचन, माहितीपूर्ण आलेख..

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  5. बहुत सी जानकारियां इस ब्लॉग के माध्यम से मेने प्रथम बार जानी। बहुत ही ज्ञानवर्द्धक ब्लॉग लिखा है।

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