भारत के स्वतन्त्रता
आन्दोलन में संघ स्वयंसेवकों की भूमिका
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अज्ञानतावश नहीं जानने वाले या राजनैतिक कारणों से जानना नहीं चाहने वाले लोग कई बार संघ की भारत के स्वाधीनता संग्राम की यात्रा में क्या भागीदारी रही – यह विषय खड़ा करते हैं | आशा है निम्नोक्त बिन्दुओं को पढने के बाद किसी की भी अंतरात्मा में फिर कभी यह प्रश्न नहीं आएगा |

संघ संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार जी के जीवन के तो
अनेकों प्रसंग स्वाधनीता संग्राम में बाल्यकाल से ही उनकी सक्रियता की गाथा कहते
हैं | फिर चाहे वो 1897 में महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के 60 वर्ष पूर्ण
होने के अवसर पर अंग्रेजी शासन द्वारा उनके नीलसीटी हाई स्कूल में बंटी मिठाई को
कूड़ेदान में फेंक देने की घटना हो, 1901 में एडवर्ड सप्तम के इंग्लैंड के राजा बनने के प्रसंग पर एम्प्रेस
मिल (नागपुर) में आयोजित आतिशबाजी कार्यक्रम में नहीं जाने का संदर्भ हो, रिसले
सर्कुलर के अनुसार वन्दे मातरम् पर प्रतिबन्ध के चलते 1910 में अपने स्कूल में आये
अंग्रेज अधिकारी का स्वागत वन्दे मातरम् से करने के कारण स्कूल से निष्कासन की बात हो, मेडिकल की पढाई करने के लिए कलकत्ता जाकर क्रांतिकरी संगठन अनुशीलन समिति में सदस्य बनकर “कोकेन” छद्मनाम से विभिन्न क्रन्तिकारी कार्यों को सम्पन्न करने का
विषय हो – ये सब घटनाएँ डॉक्टर जी के जन्मजात देशभक्त और भारत माता की स्वतन्त्रता
के लिए प्रतिपल कटिबद्ध होने का ही तो प्रमाण हैं |
रास बिहारी बोस और शचीन्द्र नाथ सान्याल द्वारा 1915 में सभी सैनिक छावनियों में
क्रांति की योजना बनी, जिसके मध्यभारत के
प्रमुख डा. हेडगेवार थे |
इतना ही नहीं, कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय दायित्व पर रहकर नागपुर वआसपास के गाँवों में असहयोग आन्दोलन के लिए लोगों को प्रेरित करना, 1920 के कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में व्यवस्था प्रमुख के रूप में और प्रस्ताव सुझाव समिति के सदस्य के रूप में काम करना और बाद में एक वर्ष का सश्रम कारावास (19 अगस्त 1921 से 12 जुलाई 1922 तक) – डॉक्टर जी की असीम देशप्रेम की बानगी हैं |
महात्मा गांधी को 18 मार्च, 1922 को छह वर्ष की सजा हुई । तब से उनकी मुक्ति तक प्रत्येक महीने की 18 तारीख 'गांधी दिन' के रूप में शाखाओं में मनाई जाती थी ।
1925 में संघ स्थापना के बाद जब 1927 में संघ की प्रतिज्ञा तय हुई तो
उसमें “भारत की स्वाधीनता” का ही संकल्प था |
1928 के साईमन कमिशन विरोध के
कार्यक्रम नागपुर में हुए, जिनमें संघ के स्वयंसेवकों ने बढ़चढ़कर भाग लिया |
संघ के विजयादशमी उत्सवों पर 1928 में बिट्ठल भाई पटेल और 1929 में मदन मोहन मालवीय जैसे विख्यात स्वतंत्रता सेनानी कार्यक्रम अध्यक्ष के रूप में आये व स्वयंसेवकों
का = मार्गदर्शन किया और उनकी देशभक्ति की प्रशंसा
की |
23 मार्च 1931 को शहीद होने वाले शिवराम राजगुरु 1926-27 में नागपुर की भोंसले वेदशाळा में पढ़ते हुए संघ के स्वयंसेवक बने थे | डॉक्टर जी से उनके
अच्छे सम्बन्ध थे , इसीलिए 1928 के सांडर्स वध के बाद राजगुरु
के उमरेड में भैया जी दाणी के बाड़े में
छिपने की व्यवस्था की गयी थी |
31 दिसम्बर 1929 को लाहौर में पूर्ण स्वराज्य प्रस्ताव पारित होने पर 26 जनवरी 1930 सायं 6 बजे को सभी
शाखाओं में स्वतन्त्रता दिवस मनाने के बड़े कार्यक्रम हुए |
1930 के गांधी जी द्वारा घोषित
सविनय अवज्ञा आन्दोलन के अंतर्गत जैसे गुजरात में गांधी द्वारा दांडी मार्च हुआ , वैसे ही नागपुर में जंगल
सत्याग्रह हुआ, जिसमें डा परांजपे को
दायित्व सौंपकर अप्पा जी जोशी, दादा राव परमार्थ जैसे 12 प्रमुख
कार्यकर्ताओं के साथ डॉक्टर हेडगेवार जी शामिल हुए और 9 महीने (21 जुलाई,1930
से 14 फरवरी, 1931) जेल में रहे सत्याग्रहियों
की सुरक्षा हेतु मार्तण्ड राव जोग के नेतृत्व में 100 स्वयंसेवकों
की अलग से एक टोली भी बनाई गई | 1931 के विजयादशमी उत्सव के
समय डॉक्टर जी जेल में ही थे |
जनवरी 1932 में बालाघाट कांड में सरकारी खजाना लूटते हुए
वीर बाघा जतिन शहीद हुए और इसी काण्ड में उसी समय बाला जी हुद्दार, जोकि संघ के सरकार्यवाह
थे, बंदी बनाये गए |
भारत की आजादी के आन्दोलन में संघ स्वयंसेवकों की भूमिका के
चलते ही मध्य भारत सरकार द्वारा 15 दिसम्बर 1932 को सरकारी कर्मचारियों के संघ में भाग लेने पर प्रतिबंध लगाया गया |
संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर
की प्रेरणा से 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के
समय विदर्भ के अष्टी चिमूर में स्वयंसेवकों द्वारा समानांतर सरकार बना दी गयी, जिसके कारण उनपर काफी अत्याचार हुए और इस घटनाक्रम में एक दर्जन स्वयंसेवक शहीद
हुए | रामटेक के नगर कार्यवाह रमाकांत केशव देशपांडे
(बालासाहब) को मृत्यु दंड सुनाया गया | इसी समय मेरठ जिले में मवाना तहसील पर झंडा
फहराते स्वयंसेवकों पर पुलिस ने गोली चलाई |
भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान भूमिगत कई बड़े कांग्रेस
नेताओं के छुपने-रुकने की व्यवस्था भी संघ के कार्यकर्ताओं के द्वारा की गयी | जेपी
और अरुणा आसफ अली जैसे नेता दिल्ली के संघचालक लाला हंसराज जी गुप्त के घर, समाजवादी अच्युत पटवर्धन और
साने गुरूजी पूना के संघचालक भाऊसाहब देशमुख के यहाँ, क्रन्तिकारी
नाना पाटिल औंध (सतारा जिला) में संघचालक
प. सातवलेकर जी के घर पर रुके | भारत छोड़ो आन्दोलन में भागीदारी का यह भी एक प्रकार था |
मई-जून 1943 में ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर विभाग की एक रिपोर्ट आज भी उपलब्ध है, जिसमें संघ शिक्षा
वर्गों (OTC) के दौरान स्वयंसेवकों के सामने हुए गुरु जी व
बाबा साहब आप्टे के भाषण का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इनके भाषणों का प्रमुख
विषय देश की आजादी के आन्दोलन में सहभागिता का आग्रह था | राजा महेंद्र प्रताप का चित्र कई संघ बैठकों में होने का जिक्र भी इस रिपोर्ट में हुआ |
ऐसी ही एक अन्य रिपोर्ट में 20 सितम्बर 1943 में नागपुर में हुई संघ की एक गुप्त बैठक का भी जिक्र है , जिसमें संघ के
स्वयंसेवकों द्वारा आजाद हिन्द फ़ौज को सहायता विषय पर विचार हुआ नेता जी और डॉक्टर जी के सम्बन्ध तो आत्मीय थे ही, इसीलिए डॉक्टर जी के
मृत्यु से एक दिन पूर्व नेता जी डॉक्टर जी से मिलने नागपुर आये थे |
जून 1948 तक भारत को स्वतंत्र करने की घोषणा के बाद 11
महीने पूर्व 15 अगस्त 1947 को आनन फानन में देश को आजाद करने का प्रमुख कारण यह था
कि वायसराय माउन्टबेटन को यह अहसास हो गया था कि इतन अधिक समय देने से भारत विभाजन
के विरोध में संघ के सहयोग से देश में
हिन्दू समाज का एक बड़ा आन्दोलन खड़ा हो सकता है और भारत विभाजन के उनके मनसूबे
अधूरे रह सकते हैं | ऐसा स्वयं माउन्टबेटन के सहयोगो लेनार्ड मोसले ने स्वीकार किया है |
आबादी के समुचित स्थानान्तरण हेतु पर्याप्त समय
दिए बिना हुए विभाजन के कारण 20 लाख लोग मारे गए और 2 करोड़ हिन्दुओं को इधर आना पड़ा | इस समय
में भी संघ स्वयंसेवकों ने उस पार हिन्दुओ की रक्षा और इस पार राहत शिविरों का
आयोजन किया |
देश के प्रथम भारत-रत्न डा भगवान दास ने 16.10.1948 को पंडित नेहरु जी को एक
पत्र लिखकर खुलासा किया कि 10 सितम्बर 1947 को मुस्लिम लीगी गुंडों की योजना थी कि सभी बड़े कांग्रेस नेताओं की हत्या
कर लालकिले पर पाकिस्तानी झंडा लहराकर दिल्ली पर कब्जे की घोषणा की जाएगी और इस
योजना की जानकारी यदि संघ के स्वयंसेवक समय से नेहरु जी और पटेल जी को नहीं देते,
तो बहुत कुछ अशुभ हो सकता था |
1946 में सिंध के हैदराबाद में पंडित नेहरु जी
की एक सभा में कुछ उपद्रव होने की सम्भावना का समाचार मिलने पर संघ के स्वयंसेवकों
ने उस सभा की सुरक्षा व्यवस्था का काम सम्भाला |
इसी प्रकार, जब गांधी जी सितम्बर 1947 में
दिल्ली की बाल्मीकि बस्ती, मन्दिर
मार्ग में ठहरे हुए थे, उस समय आसपास की बस्ती
के कुछ मुस्लिम-लीगी तत्त्वों द्वारा उपद्रव करने की आशंका के चलते गांधी जी के सहयोगी श्री कृष्णा नायर ने दिल्ली
प्रान्त प्रचारक बसंतराव औक से सुरक्षा व्यवस्था सम्भालने का आग्रह किया | संघ के स्वयंसेवकों ने
दिन रात पहरा देते हुए उस दायित्व को पूर्ण किया | इसी समय गांधी जी ने संघ
स्वयंसेवकों को सम्बोधित करते हुए 1934 में वर्धा के शीतशिविर में जाने की भी
चर्चा की |
भारत की स्वतन्त्रता के बाद जम्मू कश्मीर के
भारत में विलय के लिए महाराजा हरिसिंह को तैयार करने के लिए गृहमंत्री सरदार पटेल
जी के आग्रह पर सरसंघचालक श्री गुरूजी 17
अक्टूबर 1947 को विशेष विमान द्वारा श्रीनगर पहुंचे और महाराजा हरिसिंह को तैयार
कर लिया |26 अक्टूबर को विलय पत्र पर हस्ताक्षर हो गए |
इसी दौरान जम्मू शहर में 20000 स्थानीय मुस्लिम
विद्रोहियों का प्रतिकार स्वयंसेवकों ने किया, भारतीय वायु सेना के जहाज उतरने के
लिए जम्मू हवाई पट्टी को साफ़ और चौड़ा करने के लिए 500 स्वयंसेवकों ने 7 दिन लगातार
दिन-रात कार्य किया, सीमवर्ती कोटली शहर में पाकिस्तानी घुसपैठियो के आक्रमण से रक्षा
के लिए 6 सप्ताह तक स्वयंसेवकों ने मोर्चा सम्भाला, कोटली में ही रक्षक सेना के लिए
वायुसेना द्वारा गिराई गयी बारूद की 20 पेटियों को लाने में कृष्णलाल जी और प्रकाश
जी सहित 6 स्वयंसेवकों की शहादत हुई और ऐसे ही श्रीनगर की नागरिक सेना में भर्ती
हुए संघ कार्यकर्ता पंडित मन्मथ का बलिदान हुआ – ये सब प्रसंग हमारे लिए स्मरणीय
है |
इसी प्रकार, हैदराबाद के भारत में विलय की यात्रा में भी संघ
की विशेष भूमिका रही रजाकारों द्वारा
वहां से हिन्दुओं को भगाने की योजना थी | सरदार पटेल की प्रेरणा से मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री रविशंकर शुक्ल और गृह मंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र ने बरार प्रान्त
संघचालक बापू साहब सोहणी से मिलकर हिन्दू मनोबल बनाये रखने की योजना बनाई |
13 सितम्बर 1948 को सेना ने प्रवेश किया |
10 भारतीय सैनिक और 1200 रजाकार मारे गए और हैदराबाद का भारत में विलय हुआ |
अंग्रेजो ने तो 15 अगस्त 1947 को भारत को आजाद
कर दिया, पर
दादरा नगर हवेली और गोवा अभी भी पुर्तगाली शासन के अधीन थे | 2 अगस्त 1954 को पुणे
संघचालक विनायक राव आप्टे सहित 100 स्वयंसेवकों ने सिलवासा
के पुलिस मुख्यालय पर आक्रमण कर 175 पुर्तगाली सैनिकों का आत्मसमर्पण करवाया और मुख्यालय
पर तिरंगा फहराकर भारत सरकार को सौंपा | 2 अगस्त 1979
को सिलवासा के नागरिकों द्वारा मुक्ति की रजत जयंती के अवसर पर इन स्वयंसेवकों का अभिनंदन हुआ | 1987 में महाराष्ट्र सरकार ने इन
100 स्वयंसेवकों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित किया |
इसी प्रकार 1955 में संघ स्वयंसेवकों ने आजाद
गोमान्तक दल बनाया | पणजी
के सचिवालय पर प्रथम तिरंगा फहराने वाले स्कूल अध्यापक स्वयंसेवक थे, जिनको लिस्बन
(पुर्तगाल) की जेल में 16 साल रहना पड़ा | मथुरा के अमीर चाँद गुप्ता प्रथम शहीद हुए | 15 अगस्त
1955 को सबसे बड़े सत्याग्रही जत्थे का नेतृत्व बसंत राव ओक
ने किया | तीन गोली लगने पर भी तिरंगा गिरने नहीं दिया |
बाद में राजा भाऊ महाकाल गोली लगने के कारण बलिदान हुए | 18 दिसम्बर 1961 को भारतीय सेना ने आक्रमण किया | इस प्रकार सबसे पुराने यूरोपीय उपनिवेश गोवा-दमन दीव की मुक्ति हुई |
इस प्रकार यह स्पष्ट है
कि डॉक्टर जी के बाल्यकाल से लेकर और देश के पूर्ण स्वातंत्र्य तक की इस विशाल
यात्रा में संघ के स्वयंसेवकों ने डॉक्टर जी के समय में भी और बाद में भी उनके पदचिह्नों पर चलते हुए भारत के स्वाधीनता संग्राम में एक मौन परन्तु बलिदानों से परिपूर्ण महान परम्परा का निर्वहन किया है, जिस पर प्रत्येक स्वयंसेवक को गर्व है | संघ कार्य की
शताब्दी के विशेष अवसर पर ऐसे सभी हुतात्माओं और व्रतियों को नमन |
डा. प्रताप सिंह, हरियाणा
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