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Showing posts from December, 2021

विदेशी नव वर्ष : कितनी नवीनता , कितना हर्ष

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विदेशी नव वर्ष : कितनी नवीनता , कितना हर्ष भारत की आज़ादी का अमृत महोत्सव वर्ष पूरे देश भर में धूमधाम से मनाया जा रहा है | तमाम तरह के कार्यक्रमों के साथ ही आने वाले पच्चीस वर्षों यानि 2047 तक का एक और संकल्प सर्वत्र सुनाई देने लगा   है और वो है – “स्वाधीनता से स्वतंत्रता का सफर” | 15 अगस्त 1947 को हम स्वाधीन तो हो गए, परन्तु “स्व” पर आधारित अपने तंत्र को पूरी तरह प्रतिष्ठापित करना अभी शेष है | विगत 75 वर्षों में श्रेष्ठ सांस्कृतिक विरासत और जीवन मूल्यों के बावजूद अपनी जड़ों के नजदीक पहुँचने की बजाए पाश्चात्य (अप) संस्कृति का अविचारित अंधानुकरण ही हर ओर दिखाई देता है | विदेशों से जो बातें सीखने की थी, जैसे देशभक्ति, कार्य संस्कृति, नागरिक अनुशासन का पालन, समय पालन, नवाचारिता आदि , उनका अनुसरण तो हम नहीं कर रहे हैं, वरन वहां की अवैज्ञानिक व अ-स्वदेशानुकूल परम्पराओं के हम दीवाने हुए दीखते हैं | एक जनवरी को नये साल की शुरुआत के नाम पर मनाने की मानसिकता भी इसी का एक उदाहरण है | वास्तव में एक जनवरी को क्या बदलता है ? क्या प्रकृति में कोई बदलाव दृष्टिगोचर होता है, क्या मौसम में कोई अंतर ...

आत्मविलोपिता के उच्च प्रतिमान

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  आत्मविलोपिता के उच्च प्रतिमान संघ 100 साल का होने जा रहा है और इतने वर्षों तक लगातार संगठन शक्ति के बढ़ते जाने की एक बड़ी वजह है - संघ की अनूठी पद्धति |  इसी पद्धति के अन्तर्गत कई शब्द अनेकों बार हमारे कानों में पड़ते हैं - आत्मविलोपिता. प्रसिद्धि-परांगमुखता, व्यक्तिनिरपेक्षता, तत्वनिष्ठा आदि |  व्यक्ति-निर्माण संघ का प्राथमिक कार्य होने के कारण व्यक्ति इस कार्य के केंद्र में है, अति महत्त्वपूर्ण (Important) है, अनिवार्य (Inevitable) है,  परन्तु तथापि अपरिहार्य (Indispensable) नहीं है | और इस विशिष्ट मर्यादा रुपी गंगा की धारा हमेशा संघ के शीर्ष नेतृत्व रुपी गंगोत्री से ही अनवरत  बहती आ रही है | संघ के सभी पूजनीय सरसंघचालकों ने इस धार को लगातार तेज किया है | एक महामानवी व्यक्तित्व होने के बावजूद संघ संस्थापक डा. केशवराव बलिराम हेडगवार ने कभी अपने को संघ से बड़ा नहीं दिखने दिया | 1928 के  संघ के प्रथम गुरु पूजन कार्यक्रम के दौरान डॉक्टर जी ने ही सबके सामने यह प्रतिपादित किया कि संघ में उन समेत किसी व्यक्ति के गुरुपद पर  स्थापित होने की बजाये, हमारी चिरन्तन...

श्रीमदभगवद गीता और संघ कार्यकर्ता (गीता जयंती २०२१ को समर्पित)

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श्रीमदभगवद गीता और संघ कार्यकर्ता  भारत माता के परम् वैभव का दिव्य सपना आँखों में लिए कोटि-कोटि संघ कार्यकर्ता अहर्निश गतिमान रहते हैं | यह साधना नित्य साधना है, अखण्ड साधना है | ऐसे साधकों के लिए साधक संजीवनी के रूप में श्रीमद भगवद्गीता कदम कदम पर मार्गदर्शन करती है | तो आइये, गीता के कुछ ऐसे ही श्लोकों की यात्रा पर चलते हैं , जो प्रत्येक कार्यकर्ता के लिए हर पल पथ प्रदर्शक गुरु और मित्र का काम करते हैं | 👉18वें अध्याय के 14वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से किसी भी महान कार्य की सिद्धि के लिए पांच कारकों का उल्लेख करते हैं - उस कार्य का अधिष्ठान, उस कार्य को करने वाले कार्यकर्ताओं का स्तर, उस कार्य की सिद्धि के लिए प्रयुक्त कार्यपद्धति, उस कार्य के यशस्वी संपादन हेतु समय-समय पर की जाने वाली विविध चेष्टाएँ और दैवीय कृपा | भारत के सनातन सांस्कृतिक जीवन मूल्यों पर आधारित इस प्राचीन राष्ट्र के परम वैभव के  महान अधिष्ठान व लक्ष्य को लेकर १९२५ में शुरू हुआ संघ कार्य, इस यज्ञ हेतु अपने जीवन को समिधा रूप में समर्पित करने वाले लाखों संघ कार्यकर्ता, व्यक्ति निर्माण की स्वयंसिद्ध...