आत्मविलोपिता के उच्च प्रतिमान

 आत्मविलोपिता के उच्च प्रतिमान



संघ 100 साल का होने जा रहा है और इतने वर्षों तक लगातार संगठन शक्ति के बढ़ते जाने की एक बड़ी वजह है - संघ की अनूठी पद्धति | इसी पद्धति के अन्तर्गत कई शब्द अनेकों बार हमारे कानों में पड़ते हैं - आत्मविलोपिता. प्रसिद्धि-परांगमुखता, व्यक्तिनिरपेक्षता, तत्वनिष्ठा आदि | व्यक्ति-निर्माण संघ का प्राथमिक कार्य होने के कारण व्यक्ति इस कार्य के केंद्र में है, अति महत्त्वपूर्ण (Important) है, अनिवार्य (Inevitable) है, परन्तु तथापि अपरिहार्य (Indispensable) नहीं है | और इस विशिष्ट मर्यादा रुपी गंगा की धारा हमेशा संघ के शीर्ष नेतृत्व रुपी गंगोत्री से ही अनवरत बहती आ रही है | संघ के सभी पूजनीय सरसंघचालकों ने इस धार को लगातार तेज किया है |

एक महामानवी व्यक्तित्व होने के बावजूद संघ संस्थापक डा. केशवराव बलिराम हेडगवार ने कभी अपने को संघ से बड़ा नहीं दिखने दिया | 1928 के संघ के प्रथम गुरु पूजन कार्यक्रम के दौरान डॉक्टर जी ने ही सबके सामने यह प्रतिपादित किया कि संघ में उन समेत किसी व्यक्ति के गुरुपद पर स्थापित होने की बजाये, हमारी चिरन्तन संस्कृति का वाहक भगवा ध्वज ही संघ में गुरु होगा | यह डॉक्टर जी की दूरदृष्टि तो थी ही, साथ ही उनके आत्मविलोपी जीवन का एक ज्वलंत उदाहरण भी, वरना किसी संस्था या मत को प्रारम्भ करने वाले व्यक्ति को उस संस्था या मत का गुरु माना जाना बहुत स्वाभाविक था | इसी प्रकार नवम्बर 1929 में अप्पा जी जोशी सहित संगठन के कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने एक बैठक कर डॉक्टर जी को सरसंघचालक तय कर लिया और अगले ही दिन डॉक्टर जी को बिना बताए सरसंघचालक प्रणाम निवेदित किया | डॉक्टर जी ने अप्पा जी जोशी से अपनी नाराजगी प्रकट की और उसी रात अपनी डायरी में लिखा कि मुझे सरसंघचालक जैसा बड़ा दायित्व सौंपा गया है | एक धाय की तरह इस दायित्व का निर्वहन करने की कोशिश करूँगा और जब भी अवसर मिलेगा तो एक सामान्य स्वयंसेवक की तरह कार्य करना मुझे सर्वाधिक रूचिकर होगा | ऐसे ही एक सार्वजनिक कार्यक्रम में "भारत माता की जय" के नारे के साथ "डॉक्टर हेडगेवार की जय" का जब नारा डॉक्टर जी ने सुना तो उन्होंने तुरंत कहा कि डॉक्टर हेडगेवार की नहीं, बल्कि केवल भारत माता की जय ही हमारा एकमात्र उद्देश्य है | मध्य भारत के एक संघ शिक्षा वर्ग में अनौपचारिक वार्ता के दौरान एक किशोर कार्यकर्ता से जब डॉक्टर जी ने पूछा कि यदि तुम्हारे सरसंघचालक कहें कि भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं है तो तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होगी ? उस किशोर स्वयंसेवक ने कहा कि वैसे तो हमारे सरसंघचालक ऐसा कहेंगे नहीं और यदि कहते भी हैं तो हम सरसंघचालक बदल देंगे | ध्येयनिष्ठा की संस्कृति के इस गहरे प्रभाव को देखकर डॉक्टर जी का अभिभूत होना और उस स्वयंसेवक को गले लगाना उनकी व्यक्तिनिरपेक्षता का ही परिचायक है | आज नागपुर के रेशिम बाग़ में जो डॉक्टर जी का स्मृति मन्दिर दिखाई देता है, वह भी डॉक्टर जी के जाने के 22 साल बाद 1962 में बना | 


डॉक्टर जी के ही बनाए पदचिह्नों पर द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरु जी ने कदम आगे बढ़ाए | डॉक्टर जी के श्राद्ध कार्यक्रम में सरसंघचालक के रूप में अपने प्रथम उद्बोधन में श्री गुरु जी ने खुद को गडरिये का बालक और सरसंघचालक के दायित्व को विक्रमादित्य का सिंहासन बतलाया तथा कहा कि कार्यकर्ताओं की देवदुर्लभ टोली के आधार पर हम अपना अभीष्ट अवश्य प्राप्त करेंगे | 1973 में गुरु जी के गोलोक गमन के बाद खोले गए तीन गुप्त पत्रों में से एक पत्र से पता चला कि गुरु जी ने अपने जीते जी ही अपना श्राद्ध स्वयं कर दिया ताकि उनके जाने के बाद ऐसी कोई औपचारिकता ना करनी पड़े | साथ ही उन्होंने मृत्यु के बाद अपना स्मारक भी नहीं बनाने की बात कही थी | ऐसे आत्म विलोपी व्यक्तित्व के धनी थे श्रीगुरुजी |

संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बाला साहब देवरस ने एक आग्रह किया कि डॉक्टर जी युगपुरुष थे और श्री गुरु आध्यात्मिक विभूति थे | उनके चित्र तो ठीक हैं परन्तु मेरी मृत्य के बाद मेरा चित्र इन दोनों चित्रों के साथ नहीं लगाया जाए | साथ ही उन्होंने यह भी इच्छा पहले से सबको बताकर रखी कि डॉक्टर जी व गुरु जी की तरह उनका अंतिम संस्कार रेशिम बाग़ में करके रेशिम बाग को सरसंघचालकों का श्मशान स्थल न बनाते हुए, नागपुर के सामान्य शमशान घाट में किया जाए | बाला साहब ने परम पूजनीय शब्द का प्रयोग नाम से पहले ना करते हुए दायित्व से पहले करने की परम्परा का भी सूत्रपात किया | सबसे बड़ी बात, बालासाहब देवरस जी ने एक नई परिपाटी की शुरुआत की और वो थी अपने जीते जी अगले सरसंघचालक की नियुक्ति | 1994 में जब बाला साहब को लगा कि स्वास्थ्य कारणों से वे अब संघ कार्य के लिए आवश्यक पर्याप्त प्रवास करने की स्थिति में नहीं है तो उन्होंने प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया को सरसंघचालक की कमान सौंप दी | बीज की तरह मिटटी में खुद को गला देने का यह अनोखा उदाहरण हमारे सामने है |

इसी परिपाटी को रज्जू भैया ने आगे बढ़ाया और अपने जीवन काल में ही 2000 में कु. सी. सुर्दशन जी को सरसंघचालक नियुक्त किया, हालाँकि कुछ और वर्ष वे इस दायित्व को निभा सकते थे | रज्जू भैया ने यह इच्छा प्रकट की थी कि उनका देहान्त जहाँ पर भी हो वहीँ उनका अंतिम संस्कार किया जाए, क्योंकि भारत की रज का कण-कण मेरा है | इसी कारण मूलत: उत्तर प्रदेश के होने के बाद भी पुणे में जब 2003 में रज्जू भैया का देहांत हुआ तो उनका अंतिम संस्कार भी पुणे में ही किया गया | पांचवे सरसंघचालक सुदर्शन जी ने तो एक और कदम आगे बढाते हुए अपने स्वस्थ रहते हुए ही अपने से अधिक उर्जावान और युवा मोहन भागवत जी को सरसंघचालक का दायित्व ही नहीं सौंपा, बल्कि कुछ वर्ष नए सरसंघचालक की योजनानुसार प्रवास इत्यादि भी किया |

इस प्रकार हम देखते हैं कि अपनी व्यक्तिगत प्रसिद्धि, नाम , ख्याति आदि की लेश मात्र भी चिंता ना करते हुए ध्येय मार्ग पर आगे बढ़ते जाने की यात्रा में संघ के शीर्ष नेतृत्व ने ऊँचे प्रतिमान स्थापित किये और इसी कारण स्थान स्थान पर ऐसे अनेकों कार्यकर्ताओं की लड़ियाँ और कड़ियाँ हमें सहज दीख जाती है | इसी प्रवाह का ही तो परिणाम है कि दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के सरकार्यवाह की चुनावी प्रक्रिया 15 मिनट में सम्पन्न हो जाती है | यही ध्येयनिष्ठा और आत्मविलोपिता संघ का प्राण रही है और आगे भी रहेगी |



(इस विषय पर आपकी प्रतिक्रिया या आपके विचार comments सेक्शन के माध्यम से भेज सकते हैं )

Comments

  1. संक्षिप्त रूप में पूर्व के सभी परम् पूज्य सरसंघचालक जी का जीवनवृत समाज बंधुओं का संघ के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव का द्योतक सिद्ध होगा। सुंदर

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  2. संघ के मूल तत्व की विवेचना, श्रेष्ठ उदाहरण, सुंदर व्याख्या।
    साधुवाद

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  3. व्यक्तिनिरपेक्षता, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्र अराधना से ओतप्रोत व्यक्तित्व ही स्वयंसेवक्त्व का वाहक है।

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  4. अति महत्वपूर्ण जानकारी,एवं प्रेरणादायी लेख।

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  5. शतायु होने जा रहे संघ के मूल को सींचने वाले मोतियों की सुंदर माला।

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  6. अति सुंदर प्रेरणादायी लेख, ईश्वरीय आशिर्वाद से संघ के मूल तत्व के गुण हम सभी स्वयं सेवकों में भी आ जायें धर्म वीर

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