विदेशी नव वर्ष : कितनी नवीनता , कितना हर्ष
विदेशी नव वर्ष : कितनी नवीनता , कितना हर्ष
भारत
की आज़ादी का अमृत महोत्सव वर्ष पूरे देश भर में धूमधाम से मनाया जा रहा है | तमाम
तरह के कार्यक्रमों के साथ ही आने वाले पच्चीस वर्षों यानि 2047 तक का एक और
संकल्प सर्वत्र सुनाई देने लगा है और वो
है – “स्वाधीनता से स्वतंत्रता का सफर” | 15 अगस्त 1947 को हम स्वाधीन तो हो गए,
परन्तु “स्व” पर आधारित अपने तंत्र को पूरी तरह प्रतिष्ठापित करना अभी शेष है |
विगत 75 वर्षों में श्रेष्ठ सांस्कृतिक विरासत और जीवन मूल्यों के बावजूद अपनी
जड़ों के नजदीक पहुँचने की बजाए पाश्चात्य (अप) संस्कृति का अविचारित अंधानुकरण ही हर
ओर दिखाई देता है | विदेशों से जो बातें सीखने की थी, जैसे देशभक्ति, कार्य
संस्कृति, नागरिक अनुशासन का पालन, समय पालन, नवाचारिता आदि , उनका अनुसरण तो हम
नहीं कर रहे हैं, वरन वहां की अवैज्ञानिक व अ-स्वदेशानुकूल परम्पराओं के हम दीवाने
हुए दीखते हैं | एक जनवरी को नये साल की शुरुआत के नाम पर मनाने की मानसिकता भी
इसी का एक उदाहरण है |
वास्तव में एक जनवरी को क्या बदलता है ? क्या
प्रकृति में कोई बदलाव दृष्टिगोचर होता है, क्या मौसम में कोई अंतर नजर आता है, क्या
वस्त्रों में किसी किस्म का परिवर्तन होता है , क्या पेड़-पौधों में कोई नवीनता
दिखाई देती है, क्या विद्यार्थियों की कक्षाएँ बदलती हैं, क्या दुकानदारों के
बही-खाते बदलते है, क्या किसान भाइयों की फसल पक कर तैयार होकर उसे नई योजना बनाने
का उत्साह देती है ? इनमें से कुछ भी तो नहीं बदलता | किसी भी परम्परा में नया साल
नवीन संकल्प (रिज्योलुशन) धारण करने का शुभ अवसर होता है, पर नये संकल्प के लिए
आसपास कुछ तो नयापन दिखना चाहिए | एक जनवरी को नव वर्ष बताने वाले ईस्वी सन के
आधार रोमन कैलेंडर, जूलियन कैलेंडर और ग्रेगरीयन कैलेंडर पर भी नजर डालें, तो
विरोधाभास, अवैज्ञानिकता और स्वेच्छाचारिता के अलावा कुछ भी तो नहीं दीखता | कभी
आपने सोचा है कि अंग्रेजी के Oct, Nov और Dec शब्दों के अर्थ क्रमश: आठ, नौ और दस
होने के बावजूद अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर वर्ष का दसवां, ग्यारवहां और बारहवां
महीना कैसे है ? इसकी वजह यह है कि रोमन कैलेंडर में शुरुआत में मार्च से दिसम्बर
तक 10 महीने और 304 दिन हुआ करते थे | बाद में राजा नूमा पिम्पोलियस नें इसमें
Jonu Arius और Februarius जोडकर बारह महीनों का साल बनाया | आगे चलकर राजा जुलियस
सीजर ने अपने नाम के लिए 31 दिनों का जुलाई का महीना और ऐसे ही राजा आगस्टस नें
अपने नाम के लिए 31 दिनों का अगस्त का महीना जोड़ा | वैसे भी शेष महीनों के नामकरण
या उनमें दिनों की संख्या के विषय में किसी प्रकार की समरूपता या वैज्ञानिकता इन
कैलेंडरों में नहीं दिखती | फिर कैसे हमारी तार्किक युवा पीढ़ी इसका अनुसरण कर सकती
है ?
यह दिन हमें जहाँ ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि के शुभारम्भ का संदेश देता है, प्रभु राम और महाराजा युधिष्ठिर के राज्याभिषेक का स्मरण करवाता है, वहीँ यह दिन शकों पर विजय प्राप्त करने वाले महाराजा विक्रमादित्य का गौरवगान करता है, सिक्ख परम्परा के द्वितीय गुरु अंगददेव जी और भगवान झूलेलाल के प्राकट्य दिवस का भी पुण्य स्मरण करवाता है , आर्य समाज की स्थापना की याद दिलाता है और संघ संस्थापक डा हेडगेवार के जन्म दिवस की पावनता का अनुभव करवाता है | इतने सारे शुभ संयोगों से युक्त और पूर्णत: वैज्ञानिक व प्रकतिनिष्ठ दिन को छोडकर किसी और दिन को नव वर्ष के रूप में मनाना, यह भला कैसे स्वतंत्रता का परिचायक हो सकता है |
इन
भावों को किसी कवि ने इन पंक्तियों में पिरोया
है –
“अनमोल विरासत के धनिकों को , चाहिए कोई उधार
नहीं |
यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं , है अपना ये
त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं, है अपना ये व्यवहार नहीं “
महत्वपूर्ण विषय पर महत्वूर्ण जानकारी🙏
ReplyDeleteसार्थक जानकारी
ReplyDeleteविक्रम संवत्सर ही हमारा new year है।
ReplyDelete“अनमोल विरासत के धनिकों को , चाहिए कोई उधार नहीं |
ReplyDeleteयह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं , है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं, है अपना ये व्यवहार नहीं “