श्रीमदभगवद गीता और संघ कार्यकर्ता (गीता जयंती २०२१ को समर्पित)
श्रीमदभगवद गीता और संघ कार्यकर्ता
भारत माता के परम् वैभव का दिव्य सपना आँखों में लिए कोटि-कोटि संघ कार्यकर्ता अहर्निश गतिमान रहते हैं | यह साधना नित्य साधना है, अखण्ड साधना है | ऐसे साधकों के लिए साधक संजीवनी के रूप में श्रीमद भगवद्गीता कदम कदम पर मार्गदर्शन करती है | तो आइये, गीता के कुछ ऐसे ही श्लोकों की यात्रा पर चलते हैं , जो प्रत्येक कार्यकर्ता के लिए हर पल पथ प्रदर्शक गुरु और मित्र का काम करते हैं |
👉18वें अध्याय के 14वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से किसी भी महान कार्य की सिद्धि के लिए पांच कारकों का उल्लेख करते हैं - उस कार्य का अधिष्ठान, उस कार्य को करने वाले कार्यकर्ताओं का स्तर, उस कार्य की सिद्धि के लिए प्रयुक्त कार्यपद्धति, उस कार्य के यशस्वी संपादन हेतु समय-समय पर की जाने वाली विविध चेष्टाएँ और दैवीय कृपा | भारत के सनातन सांस्कृतिक जीवन मूल्यों पर आधारित इस प्राचीन राष्ट्र के परम वैभव के महान अधिष्ठान व लक्ष्य को लेकर १९२५ में शुरू हुआ संघ कार्य, इस यज्ञ हेतु अपने जीवन को समिधा रूप में समर्पित करने वाले लाखों संघ कार्यकर्ता, व्यक्ति निर्माण की स्वयंसिद्ध शाखा पद्धति, समय समय पर किये जाने वाले विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम और प्रभु कृपा - यही पांच तत्त्व अपने संघ कार्य की भी पहचान है | भगवान कृष्ण के श्रीमुख से उच्चारित यह श्लोक हमारे इस कार्य की सिद्धि का विश्वास और दृढ करता है |
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ १८-१४||
👉हम संघ प्रार्थना में "त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयं" पंक्ति में संघ कार्य को ईश्वरीय कार्य कहते हैं | क्यों ? क्या है ईश्वरीय कार्य | अर्जुन के बहाने हम सबको अमर सन्देश दे रहे श्रीकृष्ण ईश्वरीय कार्य को चौथे अध्याय के 7वें और 8वें श्लोक के जरिए परिभाषित करते हैं कि जब जब धर्म की हानि और अधर्म की बढौतरी होती है, तब तब मैं अवतार लेता हूँ | सज्जन शक्ति का परित्राण, दुर्जन शक्ति का दलन और धर्म की संस्थापना इन तीन कार्यों के लिए मैं हर युग में जन्म लेता हूँ | गहराई से विश्लेषण करेंगे तो पिछले 96 वर्षों से संघ इन्हीं तीन कार्यों को सतत करता आ रहा है | संघ कार्य के ईश्वरीय कार्य होने का विश्वास इन श्लोकों से स्पष्ट प्रतिपादित होता है |
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥
👉समाज में काम करने वाले संघ कार्यकर्ता या किसी भी प्रकार के सामाजिक कार्यकर्ता को कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना होता है, जिनकी तरफ पार्थसारथी प्रभु श्रीकृष्ण 18वें अध्याय के 26वें श्लोक और दूसरे अध्याय के 48वें श्लोक में संकेत करते हैं कि संगरहित रहने वाला , निरहंकारी , धैर्य और उत्साह के समन्वय से युक्त और सफलता-असफलता को निर्विकार भाव से स्वीकार करने वाला कार्यकर्ता ही सात्विक कार्यकर्ता है |
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित: | सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकार: कर्ता सात्विक उच्यते ||18.26||
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2.48।।
👉समाज के बीच काम करने वाला कार्यकर्ता का आचरण, उसका व्यवहार ही उसकी पहचान है और वह आचरण समाज के लिए प्रेरक बनता है, अनुकरणीय बनता है | श्रेष्ठ लोगों की इस वृत्ति की और प्रभु कृष्ण गीता के तीसरे अध्याय के 21वें श्लोक में कहते हैं |
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।।
👉क्या भगवान कृष्ण गीता का पावन सन्देश यदि दुर्योधन को देते तो महाभारत टल सकता था | शायद, पर कोई भी ज्ञान या सुझाव काम तो तभी करता है , जब हम उसको श्रद्धापूर्वक सुनकर तत्परता से और जितेन्द्रिय होकर आत्मसात करते हैं जोकि अर्जुन ने किया और जो दुर्योधन नहीं करने वाला था | गीता के चौथे अध्याय के 39वें श्लोक में इसी श्रद्धा के महत्त्व को प्रभु रेखांकित करते हैं |
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।4.39।।
👉हमारा निष्ठापूरित मन ही हमें संघ कार्य की सतत साधना करने के लिए तैयार करता है और यदा-कदा आने वाली मानसिक कमजोरी ही हमारी गति को मंद करती है | भगवान् श्रीकृष्ण भी मन की इस चंचलता को छठे अध्याय के 35वें श्लोक में स्वीकार करते हुए इसको दुर्निग्रह तो कहते हैं , पर अनिग्रह नहीं और नियमित अभ्यास को इस मन पर नियन्त्रण पाने का सर्वोत्तम जरिया घोषित करते हैं | संघ की दैनिक शाखा कौन्तेय को दिए गए इसी अभ्यास मन्त्र का ही तो एक रूप है |
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।6.35।।
👉समाज का संगठन व प्रबोधन करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता के लिए उसकी वाणी के महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता | इसीलिए गीता के 17वें अध्याय के 15श्लोक में योगीराज कृष्ण ने उद्वेग न करनेवाली, सत्य, प्रिय, हितकारक तथा स्वाध्याय और अभ्यास आधारित वाणी के उपयोग का आह्वान किया है, जोकि हम सबके लिए अनुकरणीय है |
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।17.15।।
👉संघकार्य में जो भी काम हमें मिलता है, जो भी दायित्व हमें मिलता है , अपने को सतत उसके योग्य बनाते जाना और उस कार्य को पूर्ण कुशलता से करना , यही योग है | "योग: कर्मसु कौशलम" का यही संदेश अर्जुन को श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय के 50वें श्लोक में दिया है
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।2.50।।
वैसे तो मोक्षदा एकादशी के पावन दिन प्रभु कृष्ण के द्वारा गीता के रूप में दिए गए सन्देश का एक एक शब्द जीवन की दिशा और दशा को सम्यक करने वाला है | सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उपरोक्त कुछ श्लोक हर समय ध्यान रखने से, स्मरण रखने से हमें उत्तम पाथेय मिलता रह सकता है | वंदे मातरम् |
अत्यंत सार्थक व प्रशंसनीय कार्य जो प्रत्येक कार्यकर्ता के लिए उपयोगी होगा। इस प्रयास से एक तो संघ की तत्त्व विवेचना को स्वयंसेवक के हृदय तक सरलता से पहुँचाया जा सकता है , दूसरा गीता के गूढ़ ज्ञान को सरल माध्यम से व्यवहार उपयोगी बनाया जा सकेगा।
ReplyDeleteनिसंदेह गीता और संघ साधना कों सरल शब्दो मे़ वर्णन किया है
ReplyDeleteकर्तव्यनिष्ठ और ध्येयनिष्ठ होना भगवान श्रीकृष्ण ने जो बताया वही डा. हेडगेवार जी ने शाखा पद्वति से प्रत्येक स्वयसेवक के जीवन मे़ आचरण के रूप मे़ साकार किया
बहुत ही सुंदर व सार्थक प्रयास।
ReplyDeleteअति उत्तम।🙏🙏
ReplyDeleteउत्तम
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